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दिवाली की सफाई के नाम पर ना करें पुराने दौर का सफाया

🤣🙏🏼तुम मेरे कागज हाथ लगाती हो तो मेरी आत्मा काँपती है। एक चीज़ मत छूना दिवाली सफाई के नाम पर।

मैं अनपढ़ हूँ क्या जो आपके जरूरी कागज़ फेक दूँगी । जबरदस्ती की इमोपोर्टेन्स शो करते हो कि मेरी फाइल मत छूना, मेरे पेपर्स सब काम के है। अब ये दो साल से अलमारी के नीचे दबा “महेंद्र न्यूज़ एजेंसी” का 200 रुपये का न्यूज़ पेपर बिल किस काम का है? क्या इसे इनकम टैक्स रिटर्न के लिए जमा करना है ?

न्यूज़ पेपर बिल मैं क्यों अपनी अलमारी में रखूँगा ? मेरी अलमारी में तुमने डाला होगा। मैं हाथ जोड़ता हूँ। दुनिया में दिवाली की रौनक मेरी अलमारी छुए बिना भी कम ना होगी। ज़माने को कानो कान खबर ना होगी कि तुम्हारे पति ने दिवाली में अपनी अलमारी साफ़ ना की। कोई हम पर थू थू न करेगा यकीन मानो ।😂

. पता नही क्यों शादी के पहले भी जब मैं अपने घर पर सफाई में भिड़ती थी तब मम्मी मेरे हाथ से सामान छीन छीनकर रैक में वापस रखते हुए दुहाई देती थी — भैय्या ये लड़की तो मेरी पूरी गृहस्थी घूरे में फेंक आएगी ।
मेरा मानना है जो चीज 4 या 5 साल तक उपयोग में नही आई वो कभी काम नही आएगी। बेहतर है ये अनुपयोगी सामान उन्हें दे दिया जाए जिसके काम की हो या फिर कबाड़ में बेच दो। उन दिनों हमारे कालोनी में पुराने कपड़ों के बदले नए बर्तन देने वाले आते थे। कपड़ों के पहाड़ के बदले टीन टपरे से भी निम्न स्तर के स्टील बर्तन पाकर लोग बड़े खुश हो जाते थे। उसमें भी बहुत झिक झिक होती — बड़ा तसला तो 20 कपड़ों के बदले मिलेगा। कुछ पुराने कपड़े इसलिए नहीं फेंके जाते कि अब ठंड आ रही है स्वेटर के अंदर पहन लेना । मैं किताबों की आलमारी की सफाई के बहाने कामचोरी करते हुए देर तक किताबे पढ़ती या पुराने अल्बम की तस्वीरें देखती बैठी रहती। जैसे ही किसी के आने की आवाज़ हो कपड़ा लेकर काँच पोछना, किताबों से धूल झाड़ना शुरू । हाय मेरी मम्मी ने हम बच्चों से बाल श्रम बहुत कराया।😂हालांकि इसमें भी कुछ पत्रिकाएं ऐसी होती थी जिन्हें या तो रद्दी में बेचो या लाइब्रेरी में दान कर आओ लायक लेकिन ये फिर झाड़ झूड़ कर अलमारी में वापस बंद हो जाती ।

अमूमन हर “दीवान” (बॉक्स वाला पलंग) के भीतर भरे सामान दिवाली की सफाई के दौरान निकाले जाते हैं। ये दीवान प्रायः उन सामानों से भरे होते है जो हमारे काम के तो होते है लेकिन रोज काम नहीं आते। उपहार में मिले ऐसे सामान जिन्हें हम उपयोग में ना लाते हुए कोरे ही किसी और के यहाँ उपहार में देकर बचत करते है 😀। दीवान में ठंड के कपड़े , मेहमानों के लिए अतिरिक्त बिस्तर, रोज़ काम न आने वाली क्राकरी और वो बेजा के नए कपड़े जो लेन देन में मिले लेकिन हमारी पसन्द के नही है। दीवान से जब ये लाव लश्कर बाहर निकलते है तो इतना पसरा देख आदमी गश खा जाए। न तो ये फेंके जाए और न रखे जाए। कीड़े- मकोड़े से बचाव के लिए छोटे अंडों सी नेफ्थलीन बाल जिसे डामर गोली भी कहते है को सभी जगह बिखेरते। दीवान के ये माल असबाब …कभी काम आएंगे … काम आएंगे ..सोचकर जो कभी काम न आए धूप दिखाने के बाद सहेजकर वापस बंद।

एक और जगह होती है जहाँ बड़े काम के बेकार सामान होते है 😂 । कमरे के छज्जे या लाफ्ट। कह सकते हैं कि यह छज्जा भानुमति का पिटारा होता है। कुछ सामान तो इसमें इतने बाबा आदम के जमाने के होते है कि उनकी आकृति से अंदाज़ा ही नही होता कि इनसे क्या काम लिया जाता है। सेव या चकली बनाने के पीतल के साँचे में सितारा , फूल आकृतियों वाली अलग अलग प्लेट्स। मैं हमेशा सोचती कि सितारा जैसे सेव इन साँचो से कैसे निकलते होंगे ?? सेवई की मशीन जिसे खाट में बाँधकर चलाने पर किसी हसीना की जुल्फों सी लहराती सेवईयाँ निकलती थी। फूल कांस के खुदरंग परात, पानी भरने ताँबे के बड़े बड़े कलशे, चूल्हे में दाल पकाने मोटे तल्ले की बटलोही। अम्मा गर्व से कहती –हमारे फूल कांस छिटदार डिजाइन के है। आरंग से खरीदे थे। पूरी बारात पानी पी ले इतना पानी आता है इन कलशों में लेकिन अब अम्मा को कौन समझाए कि 12 से 20 लीटर वाले वाटर प्यूरीफायर के जमाने में पीतल के कलशों में कौन पानी भरता है ?

लाफ्ट के ऊपर के अनोखे संसार में जैसे इस दुनिया से दस पीढ़ी पीछे का जमाना चल रहा हो । इतिहास जीना हो तो ऊपर चढ़कर छज्जे की गृहस्थी देख लो। बब्बा का हाथ से धूपने वाला पँखा महावर से पूता, नक्काशीदार पीतल के मूठ वाली छतरी। घर के कमरों में बही आधुनिकीकरण की बयार से छज्जे की दुनिया अछूती रही। ऊपर ही पहाड़ बनी एक कोने में पड़ी होती 100 मेहमानों के बैठने बिछाने की वज़नी दरी। कह कर भर देखो — अम्मा अब ये मोटी दरी किस काम की ?? अब जमीन पर बैठता कौन है ?

अम्मा को अपनी सहेजी गृहस्थी पर बड़ा गर्व था। कौड़ी कौड़ी जोड़कर, दुकानदारों से घण्टों मोलभाव हुज्जत करके सामान लाती थी। हम कहते — भला अब प्लास्टिक के नीलकमल कुर्सियों और टेंट हाउस के जमाने में इतनी वज़नी दरी जैसा कबाड़ बढ़ाकर कीड़े- मकौड़े का घर क्यों बनाना ?? मगर दिवाली की सफाई में इन्हें फेंके कौन ?? अम्मा कहती — पूछो बाबूजी से। सत्यनारायण कथा, बारसे, मुंडन, फलदान, बरीक्षा, बर बिहाव सब में हमको पास पड़ोस दरी माँगने कही नही जाना पड़ा। तीन चार साल दरी खरीदने की सोच सोचकर फिर कहीं खरीद पाए थे। उसके पहले जानकीनाथ मन्दिर के पंडित जी की चिरौरियाँ कर दरी माँगनी पड़ती थी। मंदिर की दाग धब्बे वाली दरी भला घर जैसी साफ सुथरी थोड़ी न होती है। जब हमारी तेरहवीं में जमवाड़ा होगा तब बिछाना तुम लोग इसे।

सौ बहस का एक निचोड़। लाफ्ट झाड़ पोछ लेने के बाद इस वज़नी दरी को चार आदमी हाँफते हुए फिर वापस ऊपर चढ़ाओ। पिछले 10 साल से दिवाली दर दिवाली वज़नी दरी पृथ्वी के चरणस्पर्श कर फिर उच्च स्थान आरूढ़ हो जाती थी।

अम्मा ये ढोलक कौन बजाएगा? दान कर आते हैं मन्दिर में। दान पुण्य में विश्वास रखने वाली अम्मा ढोलक दान करने से मुकर जाती। सोहर गाने फिर वो ठकुराइन घर माँगने जाओगे?  अम्मा कौन सोहर गा रहा अब ?? डीजे के जमाने में ढोलक किधर बजेंगे। अम्मा चिढ़ जाती — तुम हमारी ढोलक के पीछे मत पड़ो । तुम्हारी शादी में समधी के लाने गारी (गाली) गाने काम आएगी। इत्ती सी ढोलक ऊपर पड़ी तो कौन बवाल पड़ गया। चढ़ा दो इसे। अब भला इतनी बड़ी चक्के वाली सिलाई मशीन पर कपड़े कौन सील रहा है ?? छोटे मोटे मरम्मत के लिए पोर्टेबल इलेक्ट्रानिक मशीन है लेकिन सिलाई मशीन अम्मा के दहेज की है। अम्मा के बाबूजी ने दोस्त के हाथ पैसे देकर दिल्ली से मंगवाई थी। चलो भाई पोछपाछ के लाफ्ट में चढ़ा दो ।

फूल कांस के बर्तनों पर हर दिवाली बहस। ये मोटे तले के बर्तन चूल्हों के लिए है अम्मा, गैस के लिए नहीं। ये फालतू के बर्तन दुकान में बदलकर अभी के जमाने की क्राकरी ले आओ। लम्बी बेनतीज़ा बहस के बाद पीतल, कांस की बटलोहियां माँजकर साबुन, नीबू, इमली, पीताम्बरी से रगड़ रगड़ चमकाओ और फिर ऊपर चढ़ाओ ताकि ये बर्तन भांडे ऊपर पड़े-पड़े अगली दिवाली तक धूल खाए। मसाला कूटने वाले लोहे के खल-बट्टे अब टाइल्स लगी फर्श पर तो कूटे नही जा सकते। अब मॉल के मसालों और मोड्यूलर किचन के जमाने में साल भर का मसाला कौन रखता है। अम्मा के सामने सारे तर्क ताश के पत्तों से ढह जाते — अरे हटो बड़े काज होने पर हलवाई खल बट्ट माँगते है। तब मोहल्ले में दुवारी-दुवारी माँगने घूमोगे क्या ? सो वो कलूटा खल बट्टा भी सहमा सहमा अपने संगी साथियों सामानों के साथ ऊपर चढ़ जाते। बड़ा ताला झूलते बक्से में कीमती कबाड़ जैसे चाँदी का पानदान, चाँदी का नारियल ढक्कन पत्तर, चांदी की सुपारी, असली रेशम की काश्मीरी आसनी जो अम्मा बेटों के फलदान में समधियों के सामने वैभव प्रदर्शन करने सहेजे हुए थी ।

बिग बाजार से लिज्जत पापड़, बड़ी, अचार, बिजौरियाँ खरीदने वाली जेनरेशन जिनको इनकी रेसिपी तक नहीं पता अचार के आम काटने वाली आमकटनी का प्रयोग कब करे?  जब हम बच्चे थे हमारे घर की आम कटनी गर्मियों में मौहल्ले के घर घर घूमती। कालबेल बजी कि एक पड़ोसी बच्चा दरवाज़े पर हाजिर — मम्मी ने आमकटनी मंगवाई है । अम्मा बड़बड़ाती जाती — इतना भरा पूरा परिवार है इनका। ये बेशर्म लोग हजार आम का अचार हर साल बनाते है फिर भी हर बार हमारे पास आम कटनी मांगने चले आते है। पिछली बार मूठ तोड़ कर ले आए थे ससुरे। बोलने पर बोलने लगे हमने नहीं तोड़ी, पहले से टूटी थी। कम से कम इस बार माँगने से पहले इनको संकोच करना था। अम्मा आमकटनी थमाते हिदायत देती — जल्दी लाना । हमारे यहाँ भी आम आ गए है , अचार बनाना है । ये झूठ आमकटनी जल्दी वापस लाने का दबाव बनाने होता था जबकि हमारे आम कब के मसालों के साथ चीनी मिट्टी की बर्नियो में घूस कर सरसों तेल में डुबकियाँ मार रहे होते थे ।

अब तो अचार के आम बाज़ार से ही कटे मिलते है । किसी जमाने में कीमती रही इस गर्वीली विरासत आमकटनी पर अब जंग लग चुकी है। मम्मी कहती है अब तुम लोग नहीं हो तो अचार बनाने का मेरा मन नहीं करता। जब सब लोग थे तो तुम लोगों के टिफिन के कारण कितना भी अचार बनाओ कम ही पड़ता था। आमकटनी अपनी अनुपयोगिता के बावजूद भी दिवाली की सफाई के बाद धो पूछकर लाफ्ट में चढ़ जाएगी। मम्मी को भी लगता है ये आमकटनी खट्टी मीठी स्मृति है उनके बच्चों के बचपन की। हम बच्चे पूरी ताकत से अपनी नाजुक, गदेली मुठ्ठियाँ लकड़ी के मूठ पर मार मारकर आम काटते थे। मम्मी अपने बच्चों का बचपन कैसे फेंक दे ?

एक के ऊपर एक रखा जाने वाला स्टील टिफिन डब्बा जैसे कोई बहुमंजिला ईमारत हो। अम्मा इसमें बाबूजी को टिफिन देती थी। अम्मा चूल्हे के पास बैठकर चार डब्बों में रोटी, सब्जी,दाल , कढ़ी भरकर देती थी और बाबूजी इस स्टील के पिरामिड को लेकर ड्यूटी जाते थे लेकिन अब इस जमाने में कौन ऐसा मोहन जोदड़ो से निकला लंच बॉक्स लेकर चलेगा ? अम्मा लेकिन इसे फेंकने कत्तई राज़ी न हो। आखिर ये टिफिन उनके और बाबूजी के दाम्पत्य जीवन के संघर्ष की चंद बची गवाहियों में से एक है। बाबूजी के चले जाने के बाद अम्मा उनके आफिस का वो डब्बा कैसे फेंक दे जो ड्यूटी से लौटकर बाबूजी ये कह थमाते थे — आज खाना बहुत बढ़िया था ।

बड़े बड़े शहरों के छोटे छोटे टू बी.एच. के. फ्लैट के मॉड्यूलर किचन के ड्राअर में हजार आम के अचार की बर्निया, साल भर के अनाज के ड्रम, साल भर के लिए पीसे मसालों के लिए सच में गुंजाइश नहीं है ।

शहरी रसोई से देहात के पर्री, सूप कब के विदा ले चुके है । जिन घरों में जरा सी भी गुंजाइश है वे गैर जरूरी मगर पारम्परिक चीजों को भावनात्मक लगाव की वजह से फेंक नही पाते । सामान को घर से बेदखल कर देने पर अतीत से बिछोह की एक पीड़ा है । हर चीज से एक याद जुड़ी है , निजी स्मृतियों का लगाव है । कुछ सामान कई बार महज़ एक वस्तु न होकर बिता वक्त होता है जिसे छूकर , देखकर हम वो जमाना दुबारा जी लेते है । दिवाली पर जब बेमतलब की चीजों को उनकी अनुपयोगिता जानकर भी वापस दीवान में रखते है तो हम एक सामान नही ” एक दौर” को सहेजने की कोशिश करते है । कभी कभी हम जिसे कबाड़ कहते है वही दूसरे के जीवन की अनमोल स्मृति होते है और खूबसूरत यादों के प्रति नरमाई बरती जानी चाहिए । ❤️❤️

प्रख्यात लेखिका मधु के फेसबुक वॉल से साभार

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