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नेपाल ने अग्निपथ स्कीम के तहत हिंदुस्तानी फौज में गोरखों की भर्ती को रोक दिया

नेपाल नई दिल्ली ने कोविड महामारी की वजह से दो साल के अंतराल के बाद  भर्ती के लिए सहयोग व अनुमोदन के लिए छह हफ्ता पहले काठमांडू से संपर्क किया था।

भारतीय सेना के प्रमुख जनरल मनोज पांडे के नेपाल सेना के मानद जनरल रैंक हासिल करने के निर्धारित आगमन से कुछ दिन पहले काठमांडू ने अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में 75 साल पहले शुरू हुई गोरखाओं की भर्ती पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। सैनिकों

दोनों देशों के सेना प्रमुखों के पारस्परिक आधार पर दूसरे पक्ष के मानद जनरल होने की प्रथा उतनी ही पुरानी है, जितनी कि भारतीय सेना में गोरखा भर्ती। जनरल पांडे  पांच सितंबर को नेपाल जाएंगे और उनके दौरे से नेपाल में रहने वाले गोरखाओं की भारतीय सेना में अग्निवीर के रूप भर्ती को लेकर  छाई अनिश्चितता को दूर करने के प्रयास से जोड़ा जा रहा है।

 नेपाल के विदेश मंत्री नारायण खड़का ने नेपाल में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव को सूचित किया कि अग्निपथ योजना के तहत गोरखाओ की भर्ती 9 नवंबर 1947 को नेपाल, भारत व ब्रिटेन द्वारा हस्ताक्षरित त्रिपक्षीय प्रावधानों के मुताबिक नहीं है। खड़का ने कहा कि काठमांडू अभी राजनीतिक दलों व हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श के बाद इस मामले पर फैसला करेगा।।

 

Foreign Ministry sources said Khadka also told Srivastava that the 1947 agreement, on the basis of which Gorkhas are recruited in Indian Army, does not recognise India’s new recruitment policy under Agnipath scheme, and thus Nepal will “require to assess the impact of the new arrangement

During the meeting, sources said, the Nepal side made clear that the current recruitment scheme for a period of four years under Agnipath is not in conformity with the provisions of the 1947 agreement. There have been noticeable concerns in Nepal about the future of Gorkha recruits when they retire after four years, and the impact of these out-of-job young men — all in their twenties — on society.

The state relations committee of the Nepal Parliament, which was scheduled to discuss different issues, including the Agnipath scheme and its impact on Gorkha recruitment, was adjourned due to a lack of quorum.

Minister Khadka said it is necessary to gather opinion of all sides, including that of major political parties and stakeholders. “This is not a final decision of the government. We will get back to India after a broader understanding is formed,” a source in the ministry said.

Recruitment of Gorkhas from Nepal began in then British Indian army after the Treaty of Sagauli was signed in 1816 between the government of Nepal and the British East India Company. It became a tripartite arrangement in November 1947 after India became independent and Gorkhas in Nepal were given a choice to serve in the Indian Army or go to UK.

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